Monday, June 11, 2012

इश्क्ज़ादे



हमको सुकून, तुमको यकीन आया नहीं 
तुमने पूछा नहीं, हमने बताया नहीं 


किसी को हमसे शिकायत है आज कल 
न जाने क्यों कोई दावा उठाया नहीं ?


उनको फुर्सत है ज़माने भर से गुफ्तगू की 
बस हमारा ही ख़याल आया नहीं 


साक़ी को गिला रहा हमने उठा लिया पैमाना 
हमे रंजिश रही उसने पिलाया नहीं 


इतने भी नादान नहीं तुम, 'इश्क्ज़ादे" 
पर न वो समझे, और तुमने भी समझाया नहीं




ishQ


11th June 2012

Tuesday, May 01, 2012

ख़ता


वो   इक   कसम   मैं   लूं   या   तू   ले
वो   इक   बार   मैं   चूम   लूं   या   तू   ले


किसकी   तड़प   ज्यादा   किसका   जूनून   हावी   है
या  तो   मैं   कर   मालूम   लूं   या   तू    ले


सोचता  हूँ  कोई   ख़ता  होने   से   पहले   ‘इश्क’
रोक   अपना   दिल -ए-मजलूम   लूं   या   तू   ले



ishQ

1st May 2012

Saturday, April 28, 2012

पनाह



तुम   तक   पहुँचने   की   कोई   राह   तो   होगी
साथ   मिले   न   मिले    तेरी   पनाह   तो   होगी


बरसो   तलक   मुलाक़ात   हो   न   सही
जब   भी   मिलेंगे   वही   चाह   तो   होगी


दिल   के   ज़ख्म   न   दिखते   हैं   न   दिखाता   है   कोई
बदन   छूते ही   निकलती   आह   तो   होगी


यह  तो   कुदरत   का   घूमता   आईना   है   ‘इश्क’
उजाले  का   मजमा   फिर   तनहा   रात   सियाह   तो   होगी




ishQ

28th April 2012

Friday, April 20, 2012

दिल्लगी




गिनते  हैं   धडकनों  को
नापते  हैं   गहराई   दिल   की

खुद   को   खोने   मे
दिल्लगी   काम   आई   दिल   की


इक  चेहरे  का  नूर  था  दाखिल
खिड़की   खुली   पाई   दिल   की


दिल   के   जाने   के   बाद
बड़ी   याद   आई   दिल   की


मुद्दतों   बाद   उनके   दीदार   पे
महसूस   हुई   अंगड़ाई  दिल   की


‘इश्क’  की   इक  गाठ   ने
उलझनें   सुलझाई   दिल   की


ishQ

21st April 2012




Friday, April 13, 2012

ख़ामोशी



लफ्ज़   कम   पड़   गए   तो    लब   चूम   लिए  
कुछ   बातें   होती   हैं   ख़ामोशी    से  

वो   पल   जो   गुज़ारे   तेरी   आग़ोश   मे  
बातें    होती   है   तेरी   सरगोशी   से  

आज   जो   तेरा   दीदार   हो   गया  
‘इश्क’  हो   गया   अपनी   मदहोशी   से  

तेरी   उम्मीद    है   पर   तेरा   इंतज़ार   नहीं  
इक   सुकून   मिलता   है   इस   सरफरोशी   से  




ishQ

Friday, 13th April 2012

Monday, April 09, 2012

कभी कभी



मुख़्तसर   सी   मुलाक़ात   हो   
जाती   है   कभी   कभी 
और   सालों   की   बात    हो   जाती    है   कभी   कभी  


साँसों   की   गर्मी   और    हाथों   की   सिहरन
इक   नज़र   काम   कर   जाती   है   कभी   कभी  


वो   करीब   आता   है   तो   सांस   रुक   जाती   है
उसके   जाने   पे   भी   रुक  जाती   है   कभी   कभी  


जज़्बात   को   संभालूं   या   ज़माने   की   नज़र  
और   नीयत   भी   डगमगा  जाती   है   कभी   कभी  


बेफिक्री   उसकी   आदत   है   या   अदा   ‘इश्क’
इसकी   फिक्र   हो   जाती   है   कभी   कभी  


ishQ

9th April 2012

Monday, April 02, 2012

फकीर


कभी   ना-दीदा, कभी   फकीर   हूँ   मैं 
आप   अपना   रकीब   तो   कभी   बशीर   हूँ   मैं  


इब्तेदा   पे   न   खबर   थी    इस हिरास   की, और   अब  
मैं   ही   निशाना  , कभी   खुद   ही   तीर   हूँ   मैं 


जाने   किस   तैश   मे   है   आब -ए-आइना,  ऐ   ज़िन्दगी  
टूटे  आइने   मे   मुस्कुराती   तस्वीर   हूँ   मैं 


इस   कशमकश   से   तू   ही   उभार   ‘इश्क’ , जहां 
मैं   ही   हाकिम   और   खुद   ही   ज़ंजीर   हूँ   मैं  




ना-दीदा  – greedy
फकीर   – monk
रकीब   – competitior
बशीर  – messenger of good news
हिरास   – confusion
हाकिम   – judge
आब-ए-आइना  – polish of मिर्रोर



ishQ





Saturday, March 31, 2012

पाजेब





या   तो  दिल   मे   सैलाब   का  हिसाब   रख   लो 
या   चेहरे   पे   बेखुदी   का   नक़ाब   रख   लो 
    

उस   पल   का   इंतज़ार   है   मेरे   जानिब, जब   तुम 
अपने   पैरों   पे  हमारी  उँगलियों   की   पाजेब  रख   लो 


जागे  जागे  चलती   है   रात   साथ   मेरे 
कभी   अपनी   पलकों   पे   मेरा   भी   ख्वाब   रख   लो 


जब   'इश्क'  की   तड़प  हद्द  तक  आ    जाए 
सर्द   आहों   पे   होठों   की   ताब   रख   लो  



ishQ

31st March 2012




Sunday, March 25, 2012

शैतान


वो   ही   हर   ख्वाइश  वो  हर  अरमान  है 
उनकी  हर  अदा  हमारा  इम्तिहान  है 



उसकी  यादों  मे  सुकून  है  मगर  

इज़तेराब  की  लहरों  मे  दिल  हैरान  है 

बे-फ़िकरी   का   आलम   छाया   है   इस   कदर 
होने  को   कोई    ख़ता   बड़ी  नादान   है 

कितना   रोकूँ   सोच   की   दौड़   को 
धोका   देता   हुआ   दिल   शैतान  है  

इब्तेदा   हुई   है   जिस   सफ़र   की  हमसफ़र 
देखो   क्या   इन्तेहाँ-ए-दास्तान   है 

होश   गुम, आँखें   खुली,  सांसे  बे-परवाह 
‘इश्क’  की   शुरुआत  की   ये ही  पहचान   है  


ishQ

25th March 2012


Monday, March 19, 2012

सिलवट



नींद   कच्ची   और   ख्वाब   काँच   के 
दीदार  आधा  और  हिजाब  काँच  के 
 
आखें   खुली   हो   या   बंद   हो   पलकें 
तुम   ही  दिखते  हो  जैसे   हो  बाब  काँच  के 


तेरी  आहट  सुन   के, धड़कन   रुक  गयी 
छनक   उठे  दिल  के   असबाब  काँच  के 

रात   भर  बिस्तर   की   सिलवटों  मे   चुभते   रहे 
सवाल   काँच   के   और   जवाब   काँच   के 

जिस  शाम  हुस्न   की  टक्कर   हुई  ‘इश्क ’ से 
टूट  के  चकनाचूर  हुए  मेरे  जनाब  काँच  के 


ishQ

20th March 2012



Thursday, March 15, 2012

हसीन सवाल




ज़ंजीर  की  तरह  तेरा  ख़याल  आता  है 
रेशमी  धागों  का  जैसे  इक  जाल  आता  है 

कैदी  रहूँ  तेरा  या  तोड़  दूं  बेबसी, दिल  मे 
तुझसे  भी  हसीन  यह  हसीन  सवाल  आता  है 


या  तो  सब  कुछ  ही  चाहिए  या  कुछ  भी  नहीं 
तेरे  जूनून  का  कुछ  य़ू  दिल  मे उबाल आता  है 

बे-सबब  ही   आज कल  या  कोई  वास्ता  है  तुझसे  शायद 
जिधर  देखूं  हर  ज़र्रे  मे  रुख-ए-जमाल  आता  है 

लफ़्ज़ों  की  तासीर  तुमसे   क्या  होगी  'इश्क' 
हुस्न-ओ-अदा  का  जो   उसे  इस्तिमाल  आता  है 


ishQ

15th March 2012


Tuesday, March 13, 2012

पंखुड़ी




उड़ती हुई  आई  इक  पंखुड़ी  कहीं  से 
पलकों  से  ख़्वाबों  को  आवारा  कर  गयी 
सरक  के  रुखसार  से  होठों  पे  जा   अटकी 
इक  नई  शुरुआत  का  इशारा  कर  गयी 

इक  बार  तो  रोका  था  चाहत  के  झोंके  को 
 उसकी  खुशबू  दस्तक  दोबारा  कर गयी 


कोई  यकीन  नहीं  करता  मेरी  बातों  का 
कौन मानेगा  कि तन्हाई  मुझसे किनारा कर गयी 


यूँ  तो  मजमा  रहता  था  खामोशियों  का  यहाँ  
उसकी  हंसी  बे-नूर  ज़िन्दगी  को  सितारा  कर  गयी


साह़िर  की  तरह  उसकी  सादगी  की  छूअन    
'इश्क'  के  चिराग  मे  शरारा  कर  गयी  





ishQ

13th March 2012


Friday, March 09, 2012

गुरूर



ये जो आज हम तेरे दर आये हैं
बिलकुल अनजाने और बे-खबर आये हैं


रोक ली आह, आँसू और तमन्ना दर पे ही
भूल के भी वो अगर आये हैं


इक शक्स, इक पल, इक मुलाक़ात की बदौलत है
रूह पर जितने भी असर आये हैं


रकीब भी रफीक बन गए लेकिन
अज़ीज़ सामने निकल के ना-क़दर आये हैं


रात भर कशमकश थी गुरूर और ‘इश्क’ की
सेहर होते ही हम तेरे घर आये हैं


ishQ
 
9th March 2012
 

Tuesday, March 06, 2012

गुबार


 होठों पे आज कल इक सवाल आता है
आँखों मे बे-रंग सा गुलाल आता है


दर्द की हद्द को इतना पीछे छोड़ आए हैं
न गिला किसी से न दिल मे कोई मलाल आता है


जिस वक़्त ज़हन मे दुनिया का रिवाज़-ओ-हाल आता है
उस वक़्त मुझे बस तेरा ख़याल आता है


दिन और रात की दूरी यूँ सिमट गयी है ‘इश्क’
ख्वाब खुद नींद से अपना गुबार निकाल आता है


ishQ

7th March 2012

Sunday, March 04, 2012

मुकाबिले



उसे मुझसे, मुझे वक़्त से गिले हो गए
बनते बनते फासलों के सिलसिले हो गए




जितना मामूली था दिल का लगाना
उतने ही उलझे दिल के मामले हो गए




जिस बात का सुकून था और होने का इंतज़ार
उस उम्मीद की कोशिश भी मरहले हो गए




जला उम्मीद का शोला, जल रही थी साँसे
धड़कन बुझ गई, हम दिलजले हो गए




ख़ामोशी भी गूँज थी तेरी आस की 'इश्क'
अब तेरी सोच भी लफ़्ज़ों के मुकाबिले हो गए






ishQ
 
4th March 2012
 

Sunday, January 01, 2012

मीठी हार

उसकी  आँखों  मे  जो  ये  तलवार  सी  धार  है 
मुस्कुरा  के  ज़ख्म  खा  रहे  हैं    जाने  क्या  वार  है


तीखी  नज़र  से  जीत  ली  उसने  ज़िन्दगी  मेरी 
हमे  मंज़ूर  अपनी  ये   मीठी  सी  हार  है 


वो  सामने  होता  है  तो  वक़्त  हथेली  मे  रेत  की  तरह  निकल  जाता  है 
वो नहीं है तो उसकी खुशबू ही उसका दीदार है 


इश्क  की  इक  अलग  शक्सियत  है  जिसे  समझ  जाओ  अगर 
सुना  है  सच  झूठ,  सही  गलत  के  पार  है 


ishQ

2nd January 2012


Saturday, December 31, 2011

इक



इक  तरफ  जिद्द  है  उसके  बगैर  जिया  नहीं  जाता 
पर  इक  अनकही  हद्द  को  पार  किया  नहीं  जाता 

जिस  बात  पे  सांस  रुके  और  दम  निकल  जाए 
इक  हकीकत  है  जिसे  करार-ए-ख्वाब दिया  नहीं  जाता 

हवाओं  मे  ख़लिश  उठी  है  कोई  पोशीदा 
जाने  क्यों  इक  नाम  अब  हमसे  लिया  नहीं  जाता 

साकी, पयमाना या  जाम  किसी को तो हुई है रंजिश मुझसे
अब  इक भी  घूँट  हमसे  पीया  नहीं  जाता 

जिस्म  और  रूह  मे  येही  इक  फर्क  देखा  है 
"इश्क" का  ज़ख्म  होता  है  जो  सिया  नहीं  जाता 


 - ishQ

01.01.2012


Sunday, December 11, 2011

बेपरवाह रफ़्तार



आएगी  खबर  उसकी  इस  इंतज़ार  मे  हैं  हम 
उसकी  याद, उसके  सुरूर, उसके  प्यार  मे  हैं  हम 


हर  आहट पे  आँखें  दौड़ती  हैं, सांस  रुक  जाती  है 
इक  पल  वीराना और  कभी   महफ़िल-ऐ-बहार   मे   हैं   हम


दिल अपनी   धुन  मे, दिमाग    बेख़ौफ़    उढ़  रहा  है 
बे-काबू   जिस्म-ऐ-आरज़ू  के   ख़ुमार  मे  है  हम 


रोके   है  बद-तम्मना   और   बांधे  है   रस्म-ओ-दुनिया
र   “इश्क”  बेफ़िक्र  और  बेपरवाह  रफ़्तार   मे  है   हम 


ishQ

11th December 2011


Monday, December 05, 2011

नए फ़साने




न चाहते हुए भी गर किसी महफ़िल जाते हैं
उसके ज़िक्र पे मुस्कुरा के हम बिस्मिल जाते हैं


इक उसके दीद की आरज़ू होती है जब कभी
साथ हज़ारों तमन्ना-ओ-एहसास हो शामिल जाते हैं


जब सबके पास इक दिल है महसूस करने को
सब न जाने क्यों किये अफ़सोस-ए-दिल जाते हैं



मिलता हैं मुझसे बरसों की पहचान हो जैसे
उसके असरार-ए-वाकिफ़ से नए फ़साने मिल जाते हैं


करना है इज़हार-ए-दिल कितना कुछ उससे मगर
नज़र मिलती है ”इश्क“ से और लब सिल जाते हैं





बिस्मिल = sacrifice / lover's bait

असरार-ए-वाकिफ़ = mysterious introduction



ishQ

7th December 2011

Saturday, December 03, 2011

सोच थकती नहीं



इक  हसरत  है  जो  रूकती  नहीं 
चलती  दिल  पे  कोई  सख्ती  नहीं 

जिस्म   और  आँखें  टूट  जाए  मगर 
ज़हन  मे  तेरी  सोच  थकती  नहीं 

इक  हलकी  सी  ठोकर  और  चोट  हरा  उधर 
इधर सौ  दुआएं  जान  को  लगती  नहीं 

”इश्क” लाख  कोशिश  कर  लो  महफ़िल  मे 
मुस्कराहट  आँखों  की  शरारत  ढकती  नहीं