मुख़्तसर सी मुलाक़ात हो जाती है कभी कभी
और सालों की बात
हो जाती है कभी कभी
साँसों की गर्मी और हाथों की सिहरन
इक नज़र काम कर जाती है कभी कभी
इक नज़र काम कर जाती है कभी कभी
वो करीब आता है तो सांस रुक जाती है
उसके जाने पे भी रुक जाती है कभी कभी
उसके जाने पे भी रुक जाती है कभी कभी
जज़्बात को संभालूं या ज़माने की नज़र
और नीयत भी डगमगा जाती है कभी कभी
बेफिक्री उसकी आदत है या अदा ‘इश्क’
इसकी फिक्र हो जाती है कभी कभी
ishQ
9th April 2012

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