Sunday, March 25, 2012

शैतान


वो   ही   हर   ख्वाइश  वो  हर  अरमान  है 
उनकी  हर  अदा  हमारा  इम्तिहान  है 



उसकी  यादों  मे  सुकून  है  मगर  

इज़तेराब  की  लहरों  मे  दिल  हैरान  है 

बे-फ़िकरी   का   आलम   छाया   है   इस   कदर 
होने  को   कोई    ख़ता   बड़ी  नादान   है 

कितना   रोकूँ   सोच   की   दौड़   को 
धोका   देता   हुआ   दिल   शैतान  है  

इब्तेदा   हुई   है   जिस   सफ़र   की  हमसफ़र 
देखो   क्या   इन्तेहाँ-ए-दास्तान   है 

होश   गुम, आँखें   खुली,  सांसे  बे-परवाह 
‘इश्क’  की   शुरुआत  की   ये ही  पहचान   है  


ishQ

25th March 2012


Monday, March 19, 2012

सिलवट



नींद   कच्ची   और   ख्वाब   काँच   के 
दीदार  आधा  और  हिजाब  काँच  के 
 
आखें   खुली   हो   या   बंद   हो   पलकें 
तुम   ही  दिखते  हो  जैसे   हो  बाब  काँच  के 


तेरी  आहट  सुन   के, धड़कन   रुक  गयी 
छनक   उठे  दिल  के   असबाब  काँच  के 

रात   भर  बिस्तर   की   सिलवटों  मे   चुभते   रहे 
सवाल   काँच   के   और   जवाब   काँच   के 

जिस  शाम  हुस्न   की  टक्कर   हुई  ‘इश्क ’ से 
टूट  के  चकनाचूर  हुए  मेरे  जनाब  काँच  के 


ishQ

20th March 2012



Thursday, March 15, 2012

हसीन सवाल




ज़ंजीर  की  तरह  तेरा  ख़याल  आता  है 
रेशमी  धागों  का  जैसे  इक  जाल  आता  है 

कैदी  रहूँ  तेरा  या  तोड़  दूं  बेबसी, दिल  मे 
तुझसे  भी  हसीन  यह  हसीन  सवाल  आता  है 


या  तो  सब  कुछ  ही  चाहिए  या  कुछ  भी  नहीं 
तेरे  जूनून  का  कुछ  य़ू  दिल  मे उबाल आता  है 

बे-सबब  ही   आज कल  या  कोई  वास्ता  है  तुझसे  शायद 
जिधर  देखूं  हर  ज़र्रे  मे  रुख-ए-जमाल  आता  है 

लफ़्ज़ों  की  तासीर  तुमसे   क्या  होगी  'इश्क' 
हुस्न-ओ-अदा  का  जो   उसे  इस्तिमाल  आता  है 


ishQ

15th March 2012


Tuesday, March 13, 2012

पंखुड़ी




उड़ती हुई  आई  इक  पंखुड़ी  कहीं  से 
पलकों  से  ख़्वाबों  को  आवारा  कर  गयी 
सरक  के  रुखसार  से  होठों  पे  जा   अटकी 
इक  नई  शुरुआत  का  इशारा  कर  गयी 

इक  बार  तो  रोका  था  चाहत  के  झोंके  को 
 उसकी  खुशबू  दस्तक  दोबारा  कर गयी 


कोई  यकीन  नहीं  करता  मेरी  बातों  का 
कौन मानेगा  कि तन्हाई  मुझसे किनारा कर गयी 


यूँ  तो  मजमा  रहता  था  खामोशियों  का  यहाँ  
उसकी  हंसी  बे-नूर  ज़िन्दगी  को  सितारा  कर  गयी


साह़िर  की  तरह  उसकी  सादगी  की  छूअन    
'इश्क'  के  चिराग  मे  शरारा  कर  गयी  





ishQ

13th March 2012


Friday, March 09, 2012

गुरूर



ये जो आज हम तेरे दर आये हैं
बिलकुल अनजाने और बे-खबर आये हैं


रोक ली आह, आँसू और तमन्ना दर पे ही
भूल के भी वो अगर आये हैं


इक शक्स, इक पल, इक मुलाक़ात की बदौलत है
रूह पर जितने भी असर आये हैं


रकीब भी रफीक बन गए लेकिन
अज़ीज़ सामने निकल के ना-क़दर आये हैं


रात भर कशमकश थी गुरूर और ‘इश्क’ की
सेहर होते ही हम तेरे घर आये हैं


ishQ
 
9th March 2012
 

Tuesday, March 06, 2012

गुबार


 होठों पे आज कल इक सवाल आता है
आँखों मे बे-रंग सा गुलाल आता है


दर्द की हद्द को इतना पीछे छोड़ आए हैं
न गिला किसी से न दिल मे कोई मलाल आता है


जिस वक़्त ज़हन मे दुनिया का रिवाज़-ओ-हाल आता है
उस वक़्त मुझे बस तेरा ख़याल आता है


दिन और रात की दूरी यूँ सिमट गयी है ‘इश्क’
ख्वाब खुद नींद से अपना गुबार निकाल आता है


ishQ

7th March 2012

Sunday, March 04, 2012

मुकाबिले



उसे मुझसे, मुझे वक़्त से गिले हो गए
बनते बनते फासलों के सिलसिले हो गए




जितना मामूली था दिल का लगाना
उतने ही उलझे दिल के मामले हो गए




जिस बात का सुकून था और होने का इंतज़ार
उस उम्मीद की कोशिश भी मरहले हो गए




जला उम्मीद का शोला, जल रही थी साँसे
धड़कन बुझ गई, हम दिलजले हो गए




ख़ामोशी भी गूँज थी तेरी आस की 'इश्क'
अब तेरी सोच भी लफ़्ज़ों के मुकाबिले हो गए






ishQ
 
4th March 2012
 

Sunday, January 01, 2012

मीठी हार

उसकी  आँखों  मे  जो  ये  तलवार  सी  धार  है 
मुस्कुरा  के  ज़ख्म  खा  रहे  हैं    जाने  क्या  वार  है


तीखी  नज़र  से  जीत  ली  उसने  ज़िन्दगी  मेरी 
हमे  मंज़ूर  अपनी  ये   मीठी  सी  हार  है 


वो  सामने  होता  है  तो  वक़्त  हथेली  मे  रेत  की  तरह  निकल  जाता  है 
वो नहीं है तो उसकी खुशबू ही उसका दीदार है 


इश्क  की  इक  अलग  शक्सियत  है  जिसे  समझ  जाओ  अगर 
सुना  है  सच  झूठ,  सही  गलत  के  पार  है 


ishQ

2nd January 2012


Saturday, December 31, 2011

इक



इक  तरफ  जिद्द  है  उसके  बगैर  जिया  नहीं  जाता 
पर  इक  अनकही  हद्द  को  पार  किया  नहीं  जाता 

जिस  बात  पे  सांस  रुके  और  दम  निकल  जाए 
इक  हकीकत  है  जिसे  करार-ए-ख्वाब दिया  नहीं  जाता 

हवाओं  मे  ख़लिश  उठी  है  कोई  पोशीदा 
जाने  क्यों  इक  नाम  अब  हमसे  लिया  नहीं  जाता 

साकी, पयमाना या  जाम  किसी को तो हुई है रंजिश मुझसे
अब  इक भी  घूँट  हमसे  पीया  नहीं  जाता 

जिस्म  और  रूह  मे  येही  इक  फर्क  देखा  है 
"इश्क" का  ज़ख्म  होता  है  जो  सिया  नहीं  जाता 


 - ishQ

01.01.2012


Sunday, December 11, 2011

बेपरवाह रफ़्तार



आएगी  खबर  उसकी  इस  इंतज़ार  मे  हैं  हम 
उसकी  याद, उसके  सुरूर, उसके  प्यार  मे  हैं  हम 


हर  आहट पे  आँखें  दौड़ती  हैं, सांस  रुक  जाती  है 
इक  पल  वीराना और  कभी   महफ़िल-ऐ-बहार   मे   हैं   हम


दिल अपनी   धुन  मे, दिमाग    बेख़ौफ़    उढ़  रहा  है 
बे-काबू   जिस्म-ऐ-आरज़ू  के   ख़ुमार  मे  है  हम 


रोके   है  बद-तम्मना   और   बांधे  है   रस्म-ओ-दुनिया
र   “इश्क”  बेफ़िक्र  और  बेपरवाह  रफ़्तार   मे  है   हम 


ishQ

11th December 2011


Monday, December 05, 2011

नए फ़साने




न चाहते हुए भी गर किसी महफ़िल जाते हैं
उसके ज़िक्र पे मुस्कुरा के हम बिस्मिल जाते हैं


इक उसके दीद की आरज़ू होती है जब कभी
साथ हज़ारों तमन्ना-ओ-एहसास हो शामिल जाते हैं


जब सबके पास इक दिल है महसूस करने को
सब न जाने क्यों किये अफ़सोस-ए-दिल जाते हैं



मिलता हैं मुझसे बरसों की पहचान हो जैसे
उसके असरार-ए-वाकिफ़ से नए फ़साने मिल जाते हैं


करना है इज़हार-ए-दिल कितना कुछ उससे मगर
नज़र मिलती है ”इश्क“ से और लब सिल जाते हैं





बिस्मिल = sacrifice / lover's bait

असरार-ए-वाकिफ़ = mysterious introduction



ishQ

7th December 2011

Saturday, December 03, 2011

सोच थकती नहीं



इक  हसरत  है  जो  रूकती  नहीं 
चलती  दिल  पे  कोई  सख्ती  नहीं 

जिस्म   और  आँखें  टूट  जाए  मगर 
ज़हन  मे  तेरी  सोच  थकती  नहीं 

इक  हलकी  सी  ठोकर  और  चोट  हरा  उधर 
इधर सौ  दुआएं  जान  को  लगती  नहीं 

”इश्क” लाख  कोशिश  कर  लो  महफ़िल  मे 
मुस्कराहट  आँखों  की  शरारत  ढकती  नहीं 

Wednesday, November 16, 2011

तितली



पाया उसे  पर  देखा  नहीं  कभी 
शायद  कुछ  दूरी  बाकी  है  अभी 

वो  जो  अपना  है , पर  इक  सपना  है 
कहानी  आधी  पूरी  बाकी  है  अभी 

मायूसी  के  नशे  मे  न  उठ  के  जा  “इश्क”
जाम  लिए  आता  साक़ी  है  अभी 

तितली  उढ़  के  बैठी  गुल  पे  जैसे  होठों  पे  होठ 
कुछ  इस  तरह  तस्वीर  आंकी  है  अभी 


 - ishQ

16th November 2011

Friday, November 11, 2011

इल्म--ए-इश्क



खुशबू  सुलग  उठे हवाओं म़े वो  जब आये 
उसका नाम  लेते  ही  मुस्कराहट  बेसबब आये 

दिन  गुज़र  जाता  है   दुनियादारी  म़े 
कमबख्त न  जाने  क्यों  हर  रोज़  यह  शब्  आये 

चाहने वालों  की  नज़रों  ने  सिखा  दिया  उन्हें  नाज़-ओ-अदा 
उनकी  इक  नज़र  से    हमे  काएदा-ओ-अदब  आये 

सब्र  की  हद्द  तक  आ  गया  हूँ  मैं 
उसको  इल्म--ए-इश्क  न  जाने  कब  आये 


ishQ

11.11.11


Sunday, November 06, 2011

गलत फ़हमी



हर  हमसफ़र  सनम  नहीं  होता 
हर दर्द  की  वजह  ग़म  नहीं  होता 


इसी गलत  फ़हमी  में  जी  गए  ज़िन्दगी 
कुछ  भी  ज्यादा  या  कम  नहीं  होता 


कुछ  शक्स  सब  कह  देते  हैं  ख़ामोशी  से 
उनम़े  लफ्ज़-ओ-दम  नहीं  होता 


जैसे  कुछ  जज़्बों  का  कोई  सबब  नहीं  होता 
कुछ  ज़ख्मो  का  मरहम  नहीं  होता 


 - ishQ

6th November 2011

Saturday, November 05, 2011

ज़िद


नयी मुलाक़ात , मुद्दा पुराना

इक लफ्ज़ के सौ मतलब बन जाना


मेरा जूनून, मेरी तड़प, मेरी तिशनगी

उसकी झलक, उसकी नज़र, उसका मुस्कुराना


गर मुमकिन हो तो ही वादा करो सनम

अंजाम न पहुंचे , उसे कहते हैं फ़साना



आरज़ू -ए -इश्क की हद देखिये

जैसे किसी आदत का ज़िद बन जाना


- इश्क


5th November 2011



Wednesday, October 19, 2011

वो


कल तक सपनों मे आती थी

आज मेरी गोद मे लेटी है

दुनिया मे सबसे अनोखी

वो, मेरी बेटी है


कुछ ही दिन हुए वो घर आई

रिश्ता लेकिन है लगता सालों का

लाजवाब, एक ही जवाब है

वो, मेरे सारे सवालो का


अजब उसका खेल

अजब चाल सलोना है

दिन भर उसको सोना

और रात भर उसको रोना है


य़ू तो अब तक कभी कहीं

पूरा एक लफ्ज़ कह पाई है

आँख भर आती है मगर जब

वो, मेरी गोद मे मुस्कुराई है


आज ही हमे लगता है

कब ये बच्ची बड़ी होगी

पहले घुटनों के बल और फिर

अपने पैरों पे खड़ी होगी


बेवजह नहीं है ये

जो मैं इतना खुश दिख रहा हूँ

वो, मुझसे इक नया रिश्ता जता रहा है

मैं बस अपनी आप बीती लिख रहा हूँ


उसके गोद म़े आते ही मैंने

हर ख़ुशी सीने म़े समेटी है

सबसे अलग, सबसे अनोखी

वो, मेरी बेटी है


- ishQ

20th October 2011

Saturday, October 15, 2011

निशाना


मैं तो जाता तेरे बुलाने पर

तू खुद जाता मगर निशाने पर


तमाशा बनाए तेरी तदबीर का

कल था, आज भी भरोसा नहीं मुझे ज़माने पर


इश्ककी क्या मजाल बने तेरी रुसवाई की वजह

चाहे तमाम इलज़ाम आये तेरे दीवाने पर


तेरी महफ़िल के माहौल का एहसास यूँ हुआ

आँखों म़े इशारे हुए मेरे आने पर


ishQ

15th Oct 2011


Friday, September 23, 2011

शाम होने तक


बहुत सोचा के ख़त लिख दूं, आज शाम होने तक

नाम कर दूं सब तेरे, खुद बदनाम होने तक


तमाम उम्र न होगी बसर यूँ इंतज़ार मे तेरे

क़यामत खुद ही बुला लूं, जिस्म तमाम होने तक


साक़ी नया है, उसे कोई सबक दो मैख़ाने का

मुस्कुरा दे, "इश्क़" पे इलज़ाम होने तक


खून की सियाही बना के लिखता हूँ आखरी ख़त

शायद तू आ जाए, पूरा क़लाम होने तक



- ishQ


23rd September 2011

Sunday, July 24, 2011

तू आएगा


यूँ तो जो भी मेरा है वो तेरा हो जाएगा

पर मुझे हर चीज़ नयी देने … तू आएगा


तेरे आने की जूस्तजू, तेरे आने का इंतज़ार है

तेरे आने तक दिल कोई और आरज़ू ना कर पाएगा ... जब

तू आएगा….


ज़िन्दगी को एक नया मोड़ देने, तू आएगा

पुराना हर रास्ता ईक नया हमसफ़र पाएगा … जब

तू आएगा …


हमारी अब तक मुलाक़ात हुई नहीं मगर

क्या कोई इत्तेफाक होगा जब तू मुझे पहचान जाएगा

तू मुस्कुराएगे, मैं रोऊंगा … जब

तू आएगा …